कौशल विकास पहल योजना(एसडीआईएस) के अंतर्गत माड्यूलर रोजगारपरक कौशल (एमईएस)

रोजगार एवं प्रशिक्षण महानिदेशक

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, भारत सरकार

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(15.07.08 को अद्यतित)

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माननीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्रम एवं रोजगार, श्री ऑस्कर फर्नांडिस ने 17.12.2007 को नई दिल्ली में व्यवसायिक प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय परिषद की 36वीं बैठक में अध्यक्षता की।

 

 

माननीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्रम एवं रोजगार, श्री ऑस्कर फर्नांडिस ने 28.10.2007 को चैन्नई में माड्यूलर रोजगार कौशल (एमईएस) के लिए पुस्तकें जारी की।

आतिथ्य, कृषि, यात्रा एवं पर्यटन और सुरक्षा क्षेत्र में नए एम ई एस पाठ्यक्रम एन सी वी टी द्वारा मान्यता प्राप्त हैं।

 

15.07.2008 को एम ई एस पाठ्यक्रमों की कुल संख्या-308

 

उद्योगों को रोजगार के उभरते क्षेत्रों के बारे में बताने तथा मात्रा को पूरा करने के लिए उपयुक्त एम ई एस पीठ्यक्रमों के विकास में सहायता देने का अनुरोध किया गया है। उद्योग और अन्य पक्ष (स्टेकहोल्डर) कौशल में रह गई कमी की पहचान तथा एस एम ई एस मॉड्यूल के लिए पाठ्यक्रम का विकास कर सकते हैं।

 

"मृदुल कौशल" और "चर्म एवं खेल सामग्री" क्षेत्र के लिए पाठ्यक्रम के मसौदे पर सुझाव आमंत्रित है।

कौशल विकास पहल योजना (एस डी आई एस) के अंतर्गत माड्यूलर रोजगारपरक कौशल (एम ई एस)

श्रमिकों का कौशल स्तर और शैक्षणिक उपलब्धियां, उत्पादकता और बदलते औद्योगिक परिवेश के अनुसार अपने को ढालने की योग्यता निर्धारित करती है। अधिकतर श्रमिकों के पास विपणनयोग्य कौशल नहीं होता, जो अच्छा रोजगार प्राप्त करने और उनकी आर्थिक परिस्थिति में सुधार हेतु आवश्यक है। भारत में युवाओं की बड़ी संख्या है, लेकिन 20-24 वर्ष के आयु-समुह के केवल 5 प्रतिशत भारतीय श्रम बल ने औपचारिक माध्यमों से व्यावसायिक कौशल प्राप्त किया है, जबकि औद्योगिक देशों में यह संख्या 60 प्रतिशत से 96 प्रतिशत के बीच है। स्कूल विधार्थियो के करीब 63 प्रतिशत दसवीं कक्षा में पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, हमारे देश मे केवल 2.5 मिलियन व्यावसायिक प्रशिक्षण सीटें उपलब्ध हैं, जबकि हर वर्ष करीब 12.8 मिलियन व्यक्ति श्रम बाजार मे प्रवेश करते हैं। इन प्रशिक्षण स्थलों के अतिरिक्त, बीच मे स्कूली शिक्षा छोड़ने वालों के लिए बहुत ही कम सीटें उपलब्ध हैं। यह दर्शाता है कि बीच में स्कूली शिक्षा छोड़ने वालों के लिए अपनी रोजगार-परकता मे सुधार लाने के लिए कौशल विकास तक उनकी पहुंच नहीं है। औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में शैक्षिक रूप से प्रवेश की योग्यता तथा पाठ्यक्रम के दीर्घ अवधि का होना अल्प शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों के लिए उनके रोजगार हेतु आवश्यक कौशल प्राप्ति के मार्ग में कुछ बाधक तत्व है। इसके अलावा, भारत में नई आजीविकाओं का बड़ा भाग असंगठित क्षेत्र से आने की सम्भावना है जो राष्ट्रीय श्रम बल के 93% तक को नियोजित करता है, पर अधिकांश प्रशिक्षण पाठ्यक्रम संगठित क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।

 

वर्ष 2005-06 के बजट भाषण के दौरान माननीय वित्त मंत्री ने निम्नलिखित घोषणा कीः-

उच्च स्तर के विशिष्ट कौशल की मांग को पूरा करने के लिए सरकार और उद्योग के बीच सार्वजनिक-निजी साझेदारी का प्रस्ताव है, जिसका उद्देश्य "कौशल विकास पहल" के नाम से कौशल विकास कार्यक्रम को बढावा देना है..

 

तदनुसार श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने उद्योगों, असंगठित क्षेत्र के लघु उद्यमियों, राज्य सरकारों, विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के परामर्श से बीच में स्कूली शिक्षा छोड़ने वालों और वर्तमान श्रमिकों खासकर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कौशल विकास के लिए एक नए कार्यनीतिक ढांचे का विकास किया। यह उनकी शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक पुष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए के लिए आवश्यक था। योजना का मुख्य उद्देश्य स्कूली शिक्षक बीच में छोड़ने वालों, वर्तमान श्रमिकों, आई टी आई स्तानकों को रोजगार परक कौशल उपलब्ध कराना है। इस योजना के अंतर्गत व्यक्तियों के वर्तमान कौशल की जांच की जा सकती है। व उसे प्रमाणित भी किया जा सकता है। इसके तहत बाल श्रम से छुड़ाए गए 14 वर्ष की आयु से अधिक के श्रमिकों को रोजगारपरक कौशल उपलब्ध कराने को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि उन्हें लाभदायक रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें। यह उम्मीद की जाती है कि यह वेबसाइट योजना के बारे में सूचना के प्रचार और पारदर्शिता लाने में सहायक होगी। साथ ही बड़े पैमाने पर स्टेकहोल्डरों, और जनता का अमूल्य फीडबैक प्राप्त करने में भी सहायक होगी।.

 

 


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